Bhagavad Gītā · 2.64
☸️Karma Yoga
॥ श्लोक ॥
रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् (or वियुक्तैस्तु)आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति
arth & jeevan-path
हिन्दी अर्थMeaning
🗣️परंतु अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है |
जीवन-पाठLife Lesson
🌱परिणामों की चिंता किए बिना समत्व बुद्धि से किया गया कर्म ही जीवन में संतुलन और मुक्ति लाता है।