Bhagavad Gītā · 2.15
☸️Karma Yoga
॥ श्लोक ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते
arth & jeevan-path
हिन्दी अर्थMeaning
🗣️क्योंकि हे पुरुष श्रेष्ठ ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रियाँ और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है |
जीवन-पाठLife Lesson
🌱परिणामों की चिंता किए बिना समत्व बुद्धि से किया गया कर्म ही जीवन में संतुलन और मुक्ति लाता है।